उर्दू जुबान हिंदी से मिलकर गुलजार हो गई या हिंदी जुबान की विचारो से भरी रूह को उर्दू ने मिठास ने भर दिया । कहना मुश्किल है । खुसरो साहब ने इन दारियो को जिस संगम पर मिलाया तो मानो ग़ज़ल और कविता के अंकुरो को पनपने के लिए नई जमीन मिल गई हो ।
ग़ज़ल हमेशा से हसीन दिलो कि आवाज़ रही है । शाम की रुखसत के बाद चाहे रात अपना शामियाना लगा रही हो या सुबह परिंदे बोल रहे हो।ग़ज़ल ने हर एक पल को जुबान में तब्दील किया है ।
खुसरो एक बेहरीन पेशकार थे उन्होंने अपनी जुबान को शेरो शायरी में तब्दील किया लेकिन ग़ज़ल को दरवारी रंगत रास नहीं आई । ग़ज़ल ने अपने तराने छोडे तो निजामुददीन औलिया की दरगाह ।ग़ज़ल का ये अंदाज़ सूफी जमीन को रास आया ।उसने वो कहा जितना शायद एक शायरी में मुमकिन नहीं ।
खुसरो एक बेहरीन पेशकार थे उन्होंने अपनी जुबान को शेरो शायरी में तब्दील किया लेकिन ग़ज़ल को दरवारी रंगत रास नहीं आई । ग़ज़ल ने अपने तराने छोडे तो निजामुददीन औलिया की दरगाह ।ग़ज़ल का ये अंदाज़ सूफी जमीन को रास आया ।उसने वो कहा जितना शायद एक शायरी में मुमकिन नहीं ।
एक ग़ज़ल तकरीबन ५ से २५ शेरो की होती है जिसका हर मकता सुनने और कहने वाले दोनों को सुकून से भर देता है । शायरी जिनकी आवाज़ नहीं उन्हें ग़ज़ल फना कर देती है ।
ग़ज़ल में एक ओर जहां सूफी नगमे हैं वहीं दूसरी ओर अजीज हुस्न वालो के फसाने भी । एक तरफ ग़ज़ल तकलीफ भरे जेहन पर मरहम हैं तो दूसरी ओर उन्हीं जख्मों को कुरुदने वाला औजार भी ।
ग़ज़ल से पहले हिंदी जुबान में जिन गीतों की भरमार थी उन्हें गान कहते थे । दरवारी माहौल पर शायरी काबिज थी और शायरी काबिल लोगो की चीज है । फिर भला उसमे आम जनमानस की पसंद कया होगी ।
हालाकि ग़ज़ल और शायरी का बहुत गहरा रिश्ता है लेकिन ग़ज़ल के रूमानी और नए अंदाज़ ने लोगो को अपनी ओर खींचा । हुआ ये कि शायरी दरवारी समाज में फलती फूलती रही और ग़ज़ल ने लोगो के दिलो में जगह ले ली ।
एक तरह से देखा जाए तो ये मुश्किल नहीं जान पड़ता की हिंदी और उर्दू की आपसी रिश्ते को इस मुकाम तक लाने में जितना हाथ ग़ज़ल का है शायद शायरी का नहीं........
ग़ज़ल में एक ओर जहां सूफी नगमे हैं वहीं दूसरी ओर अजीज हुस्न वालो के फसाने भी । एक तरफ ग़ज़ल तकलीफ भरे जेहन पर मरहम हैं तो दूसरी ओर उन्हीं जख्मों को कुरुदने वाला औजार भी ।
ग़ज़ल से पहले हिंदी जुबान में जिन गीतों की भरमार थी उन्हें गान कहते थे । दरवारी माहौल पर शायरी काबिज थी और शायरी काबिल लोगो की चीज है । फिर भला उसमे आम जनमानस की पसंद कया होगी ।
हालाकि ग़ज़ल और शायरी का बहुत गहरा रिश्ता है लेकिन ग़ज़ल के रूमानी और नए अंदाज़ ने लोगो को अपनी ओर खींचा । हुआ ये कि शायरी दरवारी समाज में फलती फूलती रही और ग़ज़ल ने लोगो के दिलो में जगह ले ली ।
एक तरह से देखा जाए तो ये मुश्किल नहीं जान पड़ता की हिंदी और उर्दू की आपसी रिश्ते को इस मुकाम तक लाने में जितना हाथ ग़ज़ल का है शायद शायरी का नहीं........
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