Tuesday, November 27, 2018

कविता : १

संशय

संशय

मै कैसा व्यवहार करू
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एक तरफ जब सभी सितारे
मंजिल मेरी दूर किनारे,
सूखा रेगिस्तान सामने
जंगल बीहड़ छुट चुके हो
प्यासे पंछी झुके खड़े हो ,
एक मशक में थोड़ा पानी
पर बाकी है अभी कहानी
आहत मन जब टूट चुके हो,
मिलता साथी एक पुराना
जैसे गुजरा हुआ जमाना
बोला अब बढ़ते है आगे
मत देखो वो टूटे धागे
रेतीली सुनसान फिजा के
आगे एक सरिता है,
एक नाव उसका वो मांझी
है अपना आगे का साथी
हुआ मुझे विस्मय तब ऐसा
यह तो दिखता मेरे जैसा
भुला सारे प्राप्त सहारे
कैसे मालूम रास्ते सारे,
तू है संग मेरे जब आया
फिर कैसी यह देखू माया
वह बोला बिदकाकर आंखे
कुछ सच्ची, निर्मित कुछ बातें
बंधु मै पथ देख चुका हूं
सारे रास्ते, सभी किनारे
सब गलिया और सारे द्वारे
लोग जिन्हें तू छोड़ चुका है
भुला रहा, कुछ भुला चुका है,
चल आगे तू संग हमारे
पथ निर्विघ्न नहीं है सारे
देख रहा जो, मेरे सहारे,
चल आगे,पीछे आता हूं
संग लिए तुझको जाता हूं
नदी पार जीवन है सारा
निर्भय और निश्चिंत तुम्हारा ,
सुन इतना देखा मुड़ पीछे
खड़ा मै कबसे आंखे मीचे
सोच रहा ये साथी कैसा
संग रहे पर संग न जैसा
सच कहता या, करता क्रीड़ा
क्या ये भी संसारी वीणा
जिस कारण मन तोड़ चुका हूं
दुनिया पीछे छोड़ चुका हूं,
मै किस पर विश्वास करूं
पंथ कुपन्थ  भले अच्छे में
मै कैसा बर्ताव करू,
बता मुझे मेरे अंतर्मन
मै कैसा त्यौहार करू
अखिल विश्व के हर प्राणी से
मै कैसा व्यवहार करू ।

         © -  प्रांशु वर्मा
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