प्रकृति शिथिल ना हो जाए,
अतिशीत से ।
धधक उठे ना प्रतीहिंसा ,
मानव की तपती
प्रीत से ।
कुन्दित ना हो शक्ति,
सत्य की
प्रेम पूर्ण उत्कोचों से ।
कुचला जाय हृदय
भावना सुंदर,
मृत हो जाए ।
कृत्रिम प्रेम का,
तीव्र ज्वार
तट पर बढ़ता ही जाए ।
भाव करे भावों को उन्मत ।
ऐसा ना हो, मानव
तेरा भ्रम बढ़ता ही जाय ।
तेरा भाई बैठ गोद में,
मारण मंत्र सुनाए ।
अतिशीत से ।
धधक उठे ना प्रतीहिंसा ,
मानव की तपती
प्रीत से ।
कुन्दित ना हो शक्ति,
सत्य की
प्रेम पूर्ण उत्कोचों से ।
कुचला जाय हृदय
भावना सुंदर,
मृत हो जाए ।
कृत्रिम प्रेम का,
तीव्र ज्वार
तट पर बढ़ता ही जाए ।
भाव करे भावों को उन्मत ।
ऐसा ना हो, मानव
तेरा भ्रम बढ़ता ही जाय ।
तेरा भाई बैठ गोद में,
मारण मंत्र सुनाए ।
- प्रांशु वर्मा
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