Monday, November 25, 2019


उसको देखा, पर ?

जाता हूं सबेरे नित्य,जहा समाप्त होती है
एक गुजरी शाम कि कहानी ।
ख़ामोशी खत्म हो जाती हैं झुरमुट से आती,
दिन की पहली किरण में ।
मुझे पता है नहीं जा सकते तुम,
रात को अपने बसेरे के आगन में ।
छोड़ कर उस झील के किनारे को,
जो हैं साक्षी उस अपूर्व समय का ।
तुम्हारी उस अपूर्व अव्यक्तत्ता को ,
सोचता कब से समझ पाने को ।
रात्रि की लंबी प्रतिक्षा ,
क्यों हो जाती हैं समाप्त मेरे आते हैं ।
आभासी मन के उतरते हुए ही,
ठंडे पानी में खो जाती हो तुम ।
उजाले में डुबते जा रहे,
सुबह के आखिरी तारे की तरह ।
कहीं यह मेरा भ्रम तो नहीं !


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