Monday, November 25, 2019


भरी दुपहरी भावें छुटका को खेलना
सांझ सवेरे सुन के पूजा के बोलना
नाही बिसराबे मोहे पीपर के डरिया,
मुझको न भाबें तोरी शहर की अटरिया....!
कब होवे दिन, कब रतिया की बेरा
मालूम परत नाही, छाॅवत अंधेरा
पंछी न बोले कहीं गड़ियन के शोर में
आबत न निदिया डोले, मन  मोरो भोर भे
फंस गयो मनवा,  रे कैसी भवरिया,
छोड़ दे ललन तू, ऐसी शहरिया....!
सुख से रहब गॅवबा मनइन कै आड़ में
करब किसानी उपजैह जो धान रे
बैठ जइब नियरे चौपाल कै पुरनिया
पीवे चिलम डारी खटवा अगनिया
तोरे व्यापार, शहरी पैसा में मनिया
घुटत हमार जियरा , निकरे परनिया....!
भूल गयो तू तो अपनी नहर की पटरियां
मुझको न भावे तोरी शहर की अटरिया....!


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