भरी दुपहरी भावें छुटका को खेलना
सांझ सवेरे सुन के पूजा के बोलना
नाही बिसराबे मोहे पीपर के डरिया,
मुझको न भाबें तोरी शहर की अटरिया....!
सांझ सवेरे सुन के पूजा के बोलना
नाही बिसराबे मोहे पीपर के डरिया,
मुझको न भाबें तोरी शहर की अटरिया....!
कब होवे दिन, कब रतिया की बेरा
मालूम परत नाही, छाॅवत अंधेरा
पंछी न बोले कहीं गड़ियन के शोर में
आबत न निदिया डोले, मन मोरो भोर भे
फंस गयो मनवा, रे कैसी भवरिया,
छोड़ दे ललन तू, ऐसी शहरिया....!
मालूम परत नाही, छाॅवत अंधेरा
पंछी न बोले कहीं गड़ियन के शोर में
आबत न निदिया डोले, मन मोरो भोर भे
फंस गयो मनवा, रे कैसी भवरिया,
छोड़ दे ललन तू, ऐसी शहरिया....!
सुख से रहब गॅवबा मनइन कै आड़ में
करब किसानी उपजैह जो धान रे
बैठ जइब नियरे चौपाल कै पुरनिया
पीवे चिलम डारी खटवा अगनिया
तोरे व्यापार, शहरी पैसा में मनिया
घुटत हमार जियरा , निकरे परनिया....!
करब किसानी उपजैह जो धान रे
बैठ जइब नियरे चौपाल कै पुरनिया
पीवे चिलम डारी खटवा अगनिया
तोरे व्यापार, शहरी पैसा में मनिया
घुटत हमार जियरा , निकरे परनिया....!
भूल गयो तू तो अपनी नहर की पटरियां
मुझको न भावे तोरी शहर की अटरिया....!
मुझको न भावे तोरी शहर की अटरिया....!
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