नमस्कार,
आज हम बात करने जा रहे है । आवेश यानी एक उत्तेजना के बारे में ,जिसे आमतौर पर लोग गुस्सा समझते हैं।लेकिन वास्तव में यह उद्दीपन गुस्सा नहीं है। आवेश और गुस्से में बहुत अंतर है । आवेश एक निहायत आलाभकारी और बेकार चीज है लेकिन ऐसी बात हम गुस्से के संदर्भ में नहीं कह सकते ।
गुस्से में एक शक्ति, एक ऊर्जा सदैव निहित होती है ।यह बात दूसरी है कि इस ऊर्जा का रूप व दिशा हमेशा सकरात्मकता की ओर अग्रसर नहीं होती । किन्तु इससे हम गुस्से की महत्ता पर प्रश्न नहीं उपस्थित कर सकते।
वास्तव में हम जो गुस्से का नकारात्मक रूप देखते है वो वास्तव में उसका नकारात्मक रूप नहीं बल्कि हमारा ही नकारात्मक प्रतिरूप होता है । हमारे अंदर सहनशीलता की कमी, खुद को हर रूप में सहन न कर पाने की कमजोरी हमारे विरोधी पक्षो के प्रति एक दुर्बलता को जन्म देती है और जब हमें गुस्सा आता है तब वही दुर्बलता अविवेक लाती है और हम सही कार्य कर सकने के योग्य नहीं रह जाते ।
आज हम बात करने जा रहे है । आवेश यानी एक उत्तेजना के बारे में ,जिसे आमतौर पर लोग गुस्सा समझते हैं।लेकिन वास्तव में यह उद्दीपन गुस्सा नहीं है। आवेश और गुस्से में बहुत अंतर है । आवेश एक निहायत आलाभकारी और बेकार चीज है लेकिन ऐसी बात हम गुस्से के संदर्भ में नहीं कह सकते ।
गुस्से में एक शक्ति, एक ऊर्जा सदैव निहित होती है ।यह बात दूसरी है कि इस ऊर्जा का रूप व दिशा हमेशा सकरात्मकता की ओर अग्रसर नहीं होती । किन्तु इससे हम गुस्से की महत्ता पर प्रश्न नहीं उपस्थित कर सकते।
वास्तव में हम जो गुस्से का नकारात्मक रूप देखते है वो वास्तव में उसका नकारात्मक रूप नहीं बल्कि हमारा ही नकारात्मक प्रतिरूप होता है । हमारे अंदर सहनशीलता की कमी, खुद को हर रूप में सहन न कर पाने की कमजोरी हमारे विरोधी पक्षो के प्रति एक दुर्बलता को जन्म देती है और जब हमें गुस्सा आता है तब वही दुर्बलता अविवेक लाती है और हम सही कार्य कर सकने के योग्य नहीं रह जाते ।
हमारा संयम और स्थिरता जहां हमें इस तरह तैयार करता है कि हम गुस्से से प्राप्त हुई अपार प्राकतिक ऊर्जा का सही उपयोग कर सके वहीं दूसरी ओर आवेश उस सारी ऊर्जा को बेकार ही नस्त्र कर देता है।
आवेश गुस्से से थोड़ा पहले आता है और जब तक हम कुछ सोचने की स्थिति में आए यह पूरी चेतना को अविवेकी और हमारी कमजोरियों के हवाले कर देता है । फिर हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते क्योंकि,
ऐसे समय में हम पर हमारे आस - पास के वातावरण का प्रभाव होता है हमारा नहीं
आवेश से सुरक्षित अपने विवेक की सुरक्षित रखने का एकमात्र उपाय है।अपने अंदर स्थिरता और खुद को सहन कर पाने की योग्यता का विकास करना । आप नदी को रोक नहीं सकते, तो क्या उसकी धारा में बह जायेगे । नहीं मै इसे आपदा नहीं कहता। मै इसे आत्महत्या कहता है। ये सच है कि आप धारा को रोक नहीं सकते लेकिन उसकी दिशा को तो बदल सकते है। जिससे विनाश की जगह आपका हित है।
जिस तरह अच्छी चीजों को समाप्त करना संभव नहीं उसी प्रकार बुराई को भी नहीं मिटाया जा सकता ।लेकिन उस बुराई से मिटने की अपेक्षा क्या यह जरूरी नहीं कि हम उसमे से अपने हित का कुछ उद्योग करे।
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