Monday, November 25, 2019


मुमकिन है, जमाने से भटक जाऊ मै
जमाना हर कदम गुमराह करता फिर रहा
तौफीक खुद से जो हुई डर सा गया
पल में फरिश्ते रब कातिल हो गया
महफुज हूं अब तक, शिकस्तो में मै जो पलता रहा
वरना आफताब तो सितारों को डूबा देता है
भरोसे की हिफाजत कह भला अब कौन करता है
करे वादे वफाओं के वफाओं पर कौन करता है
बड़ी मुद्दत कयामत से,वो टुकड़ा ए दिल जो पाया था
जमाने की बगावत से न जाने किसको मिल गया
ख्यालों के जहा से जब मेरी खुली आंखे
जाऊ किधर अब तो काफिला भी गुजर गया
भटकना भी तो अच्छा है जहां साथी नहीं
रोशनी में तो साया भी भुला देता है
फक्र है मुझको अपने उस हसीन लम्हे पर
जिस वक्त तकदीर ने भी मुझे ठुकरा दिया
चोट खाके जो खुद से झगड़ बैठा
देखा कितने पर्दो का है आशिया मेरा
वक्त की मुस्कुराहट ठहाको में बदल गई
अपनी असलियत से मैंने पर्दा जो हटा दिया
मै मुसाफिर वहसी हूं , ठहरता चल कहीं देता 
भटकता मै हमेशा से, हसीं क्यू पुछूं जो रास्ता
वो बच्चा एक पैसे में खिलौने, सब तरह चाहे
ए रब तेरा तो है सब कुछ, ले दौलत कुछ नहीं देता
मेरे वालिद ने किस तरह बख्सी इनायत अपनी सब
ये बेकरारी बख्स कर, अहसास उनको था नहीं
मशहूर नहीं गर मै तो मसरूफ होना चाहता हूं
जिंदा रहे जिससे मेरी मशहूरियत की ख्वाहिशें
गुजरना आने से कितना है, अहसास संजीदा
ये ठहाके भुला देते है रोना भी पड़ेगा
वो पगडंडी जो सकरी थी, अब एक रास्ता बन गई
उड़ा दी धूल राही ने अकेला था हुजुमो में
उदासी टूट कर ख्वाबों में कहीं खो गई
जब से देखी , छाई शिकास्तो की फिजा
मुझे मालूम था लायक नहीं मै हुस्न का
वरना, इस गुजरी जिंदगी में रंग क्यू आते
टूटना ख्वाबों का सबके लिए मुमकिन कहा
मुझे गुरूर है, मै हारा अपनी कोशिश में
बड़ी नेमत से मिला, अर्सा जो तालीम का
अभी पल बाकी है, ये सोचकर भुला दिया


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