Monday, November 25, 2019


भूली सी पगडंडी मुझे जब मिल गई
पुछा जो उसने फिर मेरी बाते नई
एक तूफ़ान उठा, सरसराया, थम गया
मेरी आवाज़ देख गुजती बन के हवा,
उस हूक पे नज़रे तब टिकी ही रह गई
धधकती आग में अब राख बाकी ही रही
मेरी जिल्लत ने है पहना जो जामा शेर का
खुश्क दरिया में वो जिल्लत वह गई
सूखी आंखे नमी से भर गई
समझाऊं क्या मुझसे जो वह कह रही
मैं चीखता घुटता जेहन में रह गया
मेरी मंजिल अधूरी देखो फिर से रह गई
भूली सी पग डंडी......…   !


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