लोकतंत्र समस्त शक्तियों में आमूलचूल परिवर्तन का दाता है ।
सामाजिक, राजनीतिक अथवा आर्थिक विषयों में कोई ऐसी बात नहीं जो राजतंत्र की ऐसी बात नहीं जो लोकतंत्र में समान हितो का प्रतिनिधित्व करती हो ।
साधारण जन सत्ता पर सदैव भारी रहा है और चाहे कितना भी बड़ा राजतंत्र क्यों न हो । जनमत से कभी भी पूर्णतः निर्भय नहीं रह सका है । शासन की सहायता करना उस समाज के सबसे महान बुद्धिजीवियों का कर्तव्य है और वह राजचिहन के तले अपने इस कर्तव्य का निर्वहन करते भी आए है । लेकिन शासन पर इस वर्ग का सर्वोच्च प्रभाव होते हुए भी यह मुख्य शक्ति नहीं है ।
शासन का तरीका और शासन किसके हाथ में होगा या होना चाहिए यह सदैव समाज के सबसे निचले और सजग वर्ग पर निर्भर करता है । और इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि परिवर्तन अथवा क्रांति के बीज उन्हीं लोगो ने बोए है जो खुद अपना जीवन जीना नहीं जानते ।
राजसत्ता का यह लघु प्रभाव लोकतंत्र में पूर्ण प्रभाव में आ जाता है । देखने में तो यह लगता है कि राजतंत्र की अपेक्षा लोकतंत्र में जनतंत्र अधिक प्रबल है किन्तु यह पूर्ण रूप से सत्य नहीं है । ऐसी अनेक बाते है जो राजतंत्र में न दिखते हुए भी शासन पर अपना विस्तृत प्रभाव छोड़ती है और लोकतंत्र में खुला मंच पाने पर भी कमजोर हो जाती है । जैसे कि,
१) अति स्वतंत्रता व्यक्ति को अकर्मण्य बना देती है । उसका राष्ट्र बोध समाप्त होने लगता है और स्वय को राष्ट्र के साथ नहीं देख पाता ।
२) व्यक्ति शासन के प्रति बहुत ही सजग हो जाता है और ऐसे समय यदि वह स्वयं और राष्ट्र के हितों में भेद नहीं कर पाता तो वो स्वयं के हितों निश्चय ही प्राथमिकता देता है और कभी कभी ऐसी स्थिति उसे राष्ट्र विरोधी बना देती है ।
३ ) तीसरी और सबसे मुख्य बात यह है कि वह राष्ट्र का भले ही सम्मान करे किन्तु राष्ट्र निर्माताओं की अवहेलना करता है जो उसे राजनीतिक विषयों के और नजदीक लाती है । और प्रत्येक व्यक्ति का राजनीतिक ज्ञान होना तो आवश्यक है लेकिन हर अवसर पर स्वविवेक से ऐसे विषयो में हस्तक्षेप करना उचित नहीं ।
राष्ट्र के कुशलतापूर्वक संचालन के लिए एक सक्रिय केंद्र का होना अत्यंत आवश्यक है और यदि राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र के राजनीतिक कार्यों में हस्तक्षेप करता है तो वह अपनी केंद्र शक्ति को निश्चित रूप से कमजोर करता है ।
प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि जहां अत्यंत आवश्यक हो अपने प्रतिनिधि से अपनी राय वहीं पर एक व्यक्त करे । अपने तंत्र के लिए हर अवसर पर टीका टिप्पणी भले ही हमारा अधिकार हो लेकिन यह कही न कहीं तंत्र की स्थिरता को प्रभावित करता है जो कि हमारे हित में नहीं है
वर्तमान समय संचार क्रांति का समय है ऐसे में और हमारे लिए और भी आवश्यक हो जाता है कि सार्वजनिक तौर पर व्यक्त की गई हमारी राय पूर्ण, सारगर्भित, राष्ट्र के सम्मान से पूर्ण, आवश्यक और निष्कर्ष सहित हो ।
लोकतंत्र जहां हमें अनेक अधिकार देता है वहीं राष्ट्र के प्रति हमारी जिम्मेदारियों में भी आशातीत वृद्धि करता है । इसका सदैव ध्यान रखे । और प्रत्येक प्रतिनिधि तथा राष्ट्र का सम्मान करे ।
अपने राष्ट्र के प्रति संवेदनशीलता की वहीं भावना रखे जो आप अपने घरों के प्रति रखते है ।
यह हमारे निजी विचार है । किसी को रुचिकर न लगे तो क्षमा करें ।
धन्यवाद
आपका प्रांशु वर्मा

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